स्वामी विवेकानंद के चिंतन में मनुष्य निर्माण की अवधारणा: एक समकालीन अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.67185/vimrj.v1i4.32Keywords:
स्वामी विवेकानंद, मनुष्य निर्माण, शिक्षा, चरित्र निर्माण, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, मानवतावाद, सामाजिक उत्तरदायित्व, राष्ट्र निर्माण।Abstract
स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारतीय चिंतन के ऐसे प्रमुख विचारक हैं जिनके चिंतन में व्यक्ति, शिक्षा, समाज, धर्म, संस्कृति और राष्ट्र एक-दूसरे से गहरे रूप में संबद्ध दिखाई देते हैं। उनके विचारों की केंद्रीय विशेषता मनुष्य की अंतर्निहित शक्ति में विश्वास तथा उसके समग्र व्यक्तित्व के विकास पर बल है। विवेकानंद के लिए शिक्षा का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना, परीक्षा उत्तीर्ण करना अथवा रोजगार हासिल करना नहीं था, बल्कि ऐसी मानव शक्ति का निर्माण करना था जो आत्मविश्वासी, चरित्रवान, विवेकशील, निर्भीक, आत्मनिर्भर और समाज के प्रति उत्तरदायी हो। इसी व्यापक संदर्भ में उनकी ‘मनुष्य निर्माण’ की अवधारणा को समझा जा सकता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में स्वामी विवेकानंद के चिंतन में मनुष्य निर्माण के दार्शनिक आधार, शिक्षा की भूमिका, चरित्र निर्माण, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, शक्ति, सेवा, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण के साथ उसके संबंध का विश्लेषण किया गया है। साथ ही वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था, युवा चेतना, उच्च शिक्षा और तकनीकी परिवर्तन के संदर्भ में इस अवधारणा की प्रासंगिकता पर विचार किया गया है। अध्ययन का निष्कर्ष है कि विवेकानंद की मनुष्य निर्माण की अवधारणा व्यक्ति के भीतर ज्ञान और शक्ति का विकास करने के साथ-साथ उसे सामाजिक जीवन के प्रति संवेदनशील और उत्तरदायी बनाने पर बल देती है। वर्तमान समय में इस अवधारणा का पुनर्पाठ शिक्षा को अधिक मानवीय, मूल्यपरक, रचनात्मक और उत्तरदायी बनाने में उपयोगी हो सकता है।
