भारतीय ज्ञान परम्परा और इतिहास : विश्वबोध, भारतबोध एवं सांस्कृतिक विरासत का विमर्श

Authors

  • डॉ. चंद्रशेखर श्रीवास्तव असि. प्रो., राजनीतिक विज्ञान विभाग, श्री गणेश राय स्नातकोत्तर महाविद्यालय डोभी, जौनपुर Author

DOI:

https://doi.org/10.67185/vimrj.v1i2.9

Keywords:

भारतीय ज्ञान परम्परा, विश्वबोध, भारतबोध, सांस्कृतिक विरासत, पुरातात्त्विक संरक्षण, परम्परागत ज्ञान प्रणाली, सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना

Abstract

भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व की प्राचीनतम एवं समृद्ध ज्ञान-धाराओं में से एक है, जिसने मानव जीवन के दार्शनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और नैतिक पक्षों को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। प्रस्तुत अध्ययन में विश्वबोध, भारतबोध, सत्ता एवं वर्चस्व, नगरीय प्रबंधन, पुरातत्त्व, पुरातात्त्विक संरक्षण, मूर्त एवं अमूर्त सांस्कृतिक विरासत तथा परम्परागत ज्ञान प्रणालियों के सामाजिक-सांस्कृतिक जुड़ाव का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भारतीय ज्ञान परम्परा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है। “वसुधैव कुटुम्बकम” और सह-अस्तित्व की अवधारणा भारतीय चिंतन की वैश्विक दृष्टि को अभिव्यक्त करती है। साथ ही, भारतीय सभ्यता की नगर-योजना, जल-संरक्षण, स्थापत्य एवं सांस्कृतिक संरक्षण की परम्पराएँ उसकी व्यावहारिक बुद्धिमत्ता को दर्शाती हैं। शोध में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि औपनिवेशिक वर्चस्व और आधुनिक वैश्वीकरण के बावजूद भारतीय सांस्कृतिक चेतना निरंतर सक्रिय रही है। निष्कर्षतः भारतीय ज्ञान परम्परा का अध्ययन सांस्कृतिक आत्मबोध, सामाजिक समन्वय तथा वैश्विक मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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Published

2026-04-25

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How to Cite

भारतीय ज्ञान परम्परा और इतिहास : विश्वबोध, भारतबोध एवं सांस्कृतिक विरासत का विमर्श. (2026). Vagisha International Multidisciplinary Research Journal, 1(2), 28-35. https://doi.org/10.67185/vimrj.v1i2.9