भारत में राष्ट्रवाद का विकास: औपनिवेशिक प्रतिरोध और जनजागरण

लेखक

  • यादव रत्नेश कुमार केदारनाथ शोध छात्र, मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग, काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, ज्ञानपुर भदोही ##default.groups.name.author##
  • डॉ. मनोज सिंह यादव सहायक आचार्य, मध्यकालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग, काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, ज्ञानपुर भदोही ##default.groups.name.author##

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https://doi.org/10.67185/vimrj.v1i2.13

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मुख्य शब्दः राजनीतिक चेतना, जनजागरण, राष्ट्रवाद, उपनिवेशवाद, स्वतंत्रता आंदोलन।

सार

सारांश भारत में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष से जो राष्ट्रवाद उभरता है वह अपने आप में अनूठा और अलग था। विचार जगत में भारतीय राष्ट्रवाद एक नितांत नई परिघटना थी जो इसके पहले विश्व में कहीं नहीं देखी गई थी। यह राष्ट्रवाद मूल रूप से लोकतांत्रिक और समानता पर आधारित था और शक्ति विस्तार पर आधारित यूरोपीय राष्ट्रवाद से सर्वथा भिन्न था। औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध के प्रतिफल के रूप में प्राप्त भारत का राष्ट्रवादी विचार विभिन्न कारणों से दुनिया के अन्य देशों के राष्ट्रवाद के विचार से अलग है। आधुनिक भारत के इतिहास से यह स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय आंदोलन का अपना एक सशक्त सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आधार था जिसने भारतीय राष्ट्रवाद को गति दी। भारत में राष्ट्रवाद का विकास एक निरंतर चलने वाली सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया रही है, जिसमें औपनिवेशिक प्रतिरोध और जनजागरण दोनों ने परस्पर पूरक की भूमिका निभाई और स्वतंत्रता संग्राम को राष्ट्रीय आंदोलन में रूपांतरित किया।

 

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प्रकाशित

2026-04-25

अंक

खंड

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